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Tuesday, August 8, 2017

ग़ज़ल- इन्तहां


अमित शुक्ला 
कविता और ग़ज़ल लेखन के धनी अमित शुक्ला की कलम से निकली ग़ज़ल "इन्तहां"...पढ़ें..पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरूर करें... 






ग़ज़ल - इन्तहां 

कब इन्तहां होगी आपकी मुझको सताने की
जहमत जरा उठा लीजिए मुझको बताने की ।
आप ही इल्जाम लगाते हैं बार बार 
वरना है क्या मजाल इस जमाने की ।
कभी दिल माँगते हो और कभी जान

छोड़ी नहीं है कोई कसर आजमाने की ।
हजार गम भी हों तो छुपा लेते हैं दिल में
आदत बहुत बुरी है मेरी मुस्कुराने की ।
जलता रहा हूँ मैं सनम आपकी खातिर
ऐसा दीया जो फिराक में है खुद को बुझाने की ।



..........अमित .......


---अमित शुक्ला, अध्यापक, बरेली,  उ प्र बेसिक शिक्षा परिषद् 

Monday, July 3, 2017

कविता - केसरिया मन



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अंकुर पटेल 
अंकुर पटेल की लिखी कविता "केसरिया मन"...पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरूर करें...












कविता - "केसरिया मन"

"केसरिया मन"

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एक झोंका जो मन को सहला जाए
एक मुस्कराहट जो मस्तक की सिकुड़न को मिटा जाए
एक तल्लीनता जो जीवन को आनंद दे।
सूर्य की रोशनी होते ही फूलों की तरह खिल उठे,
काश! दिन हो एक जिस से मुझे जाना है।
दिन-भर इबारत हो खुशनुमा बसंत की
बन्द घर से खुले खेत धानी की
पावस की उमस से हटकर घिरते बादलों की
श्यामल नील सलिल में उड़ती तितली की
जिससे मन हुंकार मारे बार-बार डमरू की तरह,
काश! दिन हो एक जिस से मुझे जाना है।

©अंकुर पटेल


- "अंकुर पटेल"
Student, B.Sc. (H), Physics,
Deen Dayal Upadhyaya Colege, Delhi

  

Sunday, June 18, 2017

कविता - इन्सान


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अमित शुक्ला 
अमित शुक्ला की लिखी कविता "इन्सान"...पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरूर करें...




इन्सान

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हाथ में संग लिए हर शख्स खड़ा रहता है ।
काँच का दिल है फिर भी ये अड़ा रहता है ।
एक तस्वीर किसी की है दिल में न बिखर जाये ।
खौफ इसी बात का हर वक्त बड़ा रहता है ।
जिस राह के पत्थर ने जाने से उन्हें रोका था ।
वह आज भी ठोकर के लिए वहीं पड़ा रहता है ।
चंद दिन की जिन्दगी कुछ पलों का है सुकून ।
फिर जाने क्यों इंसां इंसां से लड़ा रहता है ।

@अमित शुक्ला@


अध्यापक,(बरेली), उ प्र बेसिक शिक्षा  परिषद




Saturday, June 10, 2017

कविता - दोस्ती दुश्मनी


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कवि बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'
कवि बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' की लिखी कविता 'दोस्ती दुश्मनी'...पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरूर करें...





कविता - दोस्ती दुश्मनी

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मेरे दादा मुझे अकसर सबक यह ही सिखाते हैं| 
बनाना दोस्त मत बेटा ये खंज़र घोंप जाते हैं|

झुकाते सर न मंदिर में न सज़दा यार करते हम 
 तिरंगे की पनाहों में महज सर को झुकाते हैं|

पडोसी मुल्क ये अपना रहा दुश्मन हमेशा फिर
क्यों दिल्ली मौन बैठी है चलो जी पूछ आते हैं|

सुनो कश्मीर का मुद्दा नहीं सुलझाएगी दिल्ली 
 सियासत का इसे जरिया महज नेता बनाते हैं|

क़लम बन्दूक बन जाये सियाही आग उगलेगी 
चलो फिर से क़लम की धार को हम आज़माते हैं।

मुहब्बत का सुमन फिर से खिलाएं बागवां बनकर 
मिलाकर दिल-गले सबसे चलो नफरत मिटाते हैं

सुना है मुल्क अपना भी कभी सोने की चिड़िया था
चलो भारत को सोने की पुनः चिडिया बनाते हैं


--कवि  बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' 
संपर्क - जी- ३०३, महादेव एवेन्यु, नानी केनाल , जमुना पार्क के सामने, वस्त्राल, अहमदाबाद- ३८२४१८ मो. नंबर +91-9998679899
वर्तमान पता- बिरला पब्लिक स्कूल, दोहा- क़तर, पोस्ट बॉक्स नम्बर-२४६८६, मो. नंबर +974-33187997 


Thursday, May 25, 2017

कविता - "प्रीत की प्यारी"



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अंकुर पटेल 
अंकुर पटेल की लिखी कविता "प्रीत की प्यारी"...पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरुर करें...







प्रीत की प्यारी

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प्रीत की प्यारी हो तुम
मधुबन की दासी बनके मत रह जाना।
हो प्यार हमसे
किसी और की बनके मत रह जाना।
यूँ तो गीत बहुत लिखे है तेरे लिए,
उन्हें आवाज़ देते मत रह जाना।
हर लम्हे ने जोड़ा है तुझे मुझसे,
उन्हें बस अपनी बाहों में समेटे मत रह जाना ।
इजहार हो कुछ इस तरह का,
बस ऐसी किताब बनके मत रह जाना।
दिल की धड़कन तुझे पुकारें बस इसी तरह,
कुछ ऐसी तक़दीर लेके मत रह जाना।
गुजरूँगा एक दिन तेरी आँखों से,कुछ अहसास और अरमान लेकर,
बस उन्हें अपना नाम देते मत रह जाना।
प्रीत की प्यारी हो तुम
मधुबन की दासी बनके मत रह जाना।
                                            ©अंकुर पटेल


- "अंकुर पटेल"
Student, B.Sc. (H), Physics,
Deen Dayal Upadhyaya Colege, Delhi


Wednesday, May 24, 2017

कविता - "यादें"



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शैलेन्द्र मुहाले 
प्रस्तुत है शैलेन्द्र मुहाले की लिखी कविता "यादें"..पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर जरुर करें...










कविता - "यादें"

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तस्वीर ऑखो में बसाता क्यों हैं
बताना ही हैं तो छिपाता क्यों है
आदत है उसे भूल जाने कुछ
बातों को बार बार दोहराता क्यों है 
बेफ़िक्र है लोग यहाँ अपने आप से 
इन्हे वो सब याद दिलाता क्यों है
कहीं तो होंगी कदमों की मंजिल 
नई राहों को फिर आजमाता क्यों है 
मचल उठे आज कुछ जज्बात फिर
यादों को बार बार बुलाता क्यों है



-- शैलेन्द्र मुहाले, अधिकारी Scale I(बैंक –सार्वजनिक क्षेत्र) 
इंद्रा कालोनी, मेन रोड, बनपुरा, मध्य प्रदेश    

कविता - "सरहद"


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बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'
प्रस्तुत है कवि बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' की लिखी नयी कविता "सरहद"...पढ़ें...पसंद आये तो कमेंट व शेयर अवश्य करें... 







कविता - सरहद 

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वर्दी इक सिलवा दे माँ सरहद पे लड़ने जाना है |
हिम्मत कितने रखते हैं हम दुश्मन को बतलाना है |


सरहद के अन्दर आने की बात अगर भी सोची तो
सच कहता हूँ दुश्मन को माँ जिंदा ही दफनाना है |


चुन चुन कर है मार गिराना सूअर के औलादों को
भारत की ताकत का उनको लोहा भी मनवाना है


वर्षों से अब तक माँ देखो माफ़ ही माफ़ किये सबको
अब छठ्ठी का दूध भी माँ दुश्मन को याद दिलवाना है |


बाबू जी जैसे आये थे सरहद पर से लौट के माँ
वैसे ही ताबूत में सोकर हमको भी घर आना है |


देती हूँ आशीष मैं तुमको जा बेटा पर याद रहे
मातृभूमि का कर्ज चुका कर ही घर वापिस आना है |


सरहद की रखवाली करते शीश कटे तो कट जाए
पर दुश्मन को भूल से बेटे पीठ नहीं दिखलाना है | 



 ---- बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’ 
संपर्क सूत्र -  जी- ३०३, महादेव एवेन्यु,नानी केनाल , जमुना पार्क के सामने,वस्त्राल, अहमदाबाद- ३८२४४९,मो. नंबर- +91 9998679899

वर्तमान पता- बिरला पब्लिक स्कूल, दोहा- क़तर,पोस्ट बॉक्स नम्बर-२४६८६,मो. नंबर-  +974 -33187997


Sunday, May 7, 2017

कविता - "अपने गाँव की होली"

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शैलेन्द्र मुहाले 
शैलेन्द्र मुहाले  की लिखी कविता "अपने गाँव की होली" पढ़ें...और शेयर करें...








अपने गाँव की होली

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मुझे अपने गाँव की
होली याद आती है 

अपने मतवाले दोस्तों की 
टोली याद आती है
चाहे किसी पेड़ की शाख हो 
या किसी घर का
लकड़ी का सामान 
अपने मतवाले दोस्तों की
हर घर से चोरी याद आती है
मुझे अपने गाँव की
होली याद आती है
घर घर जाकर 
दोस्तों को रंगना 
ठोल की थाप पर 
मस्ती  से उछलना
रंग लगी शक्लों
का वो हंसना 
हर गली में शोर
मचाते उछलना 
वो शोर हुडदंग
मस्ती याद आ
याद आती है 
मुझे अपने गाँव की
होली याद आती है
वो भांग की गोली
खाकर बहकना
अपने दोस्तों की
शक्लें देखकर हंसना
बचकर भागने वालों
का वो पल  दौड़कर पकड़ना
याद आती है वो बातें
मन को गुदगुदाती है 
मुझे अपने गाँव की
होली याद आती है

  

शैलेन्द्र मुहाले, अधिकारी Scale I(बैंक –सार्वजनिक क्षेत्र)  
इंद्रा कालोनी, मेन रोड, बनपुरा, मध्य प्रदेश